AZADI KA DIWANAPAN (POEM)

From my balcony, I can see the adjoining balcony of my neighbor, where hangs a beautiful golden cage with a beautiful golden bird inside. Today evening, with my mug of coffee, as I sat on my favorite rocking chair, the soothing breeze, made me imagine…what will the bird think about freedom? If she gets a chance, will she fly away or not? She will choose the luxury and pamparing or the open unlimited sky? After a dilema I was sure, she will choose the liberation of her soul, emancipation of self and will uncage herself…

Let your wings of imagination take a leap to fly with my poem…

                     आजादी का दिवानापन

आज भुल गए वह पिंजरे को बन्द करना,
सोन चिडिया ने धीरे से खुद को समझाया, मत डरना,
कर साहस, आज उड़ जा, मौका नही मिला, फिर मत कहना,
आजादी का चख स्वाद, जंजीरो को अब मत सहना ।

 
फुदक कर खिड़की तक पहुंची, चिडिया प्यारी,
वो मन्त्रमुग्ध हो विशाल आकाश को निहारी,
खुले आसमान की छटा थी अद्भुत और निराली,
इस आमंत्रण पे हो गई वो वारी वारी ।

 
पंखो को फैला कर, एक गहरी सांस ले, खुद को समेटकर,
उसने सोचा, ऐसी आराम की जिन्दगी को त्यागकर,
क्यों भटकना, दाना-पानी की तलाश में खुद को थकाकर,
लौट आई वो पिंजरे में, बीत गई पुरी रात सोच सोचकर ।

 
पौ फटते ही धिक्कार उठा उसका मन,
चन्द दाना, चन्द खाना, तो मिलते है कण कण,
इसके आगे क्या छोटा हो गया, सपना जो देखा हर क्षण,
मुक्ति की उन्मुक्त खुशी ही है, वो असली सच्चा धन ।

 
उड़ चली वो खुले आसमान मे झुमकर,
रोम रोम मे महक उठा आलौकिक वो सुधाकर,
जिन्दगी तो जीने की परिभाषा है, पीछे मत हट डरकर,
बेड़ियां क्या रोके उनको, जो जीते है अपने दम पर ।।