BARGAD AUR AMALTAS (POEM)

Travelling by road from Nagpur to 300km interior in the jungle, heading towards one of the project sites of my husband, seeing the trees, plants, beautiful patches of greenery, …gave birth to the poem. The Banyan tree was looking like the king of jungle and this beautiful yellow flowering tree ‘Golden Shower’ was simply gorgeous.

Does every love story has a happy ending, or someone sacrifices, or they claim to have a perfect understanding, or the external pressure of family and peers seperate them, or it’s euphoria…the endless ‘or’ becomes cacophony…well, it’s like asking…does an insomniac often need a soporific??

Hey, let my Banyan tree and Golden Shower tree lead rest of the conversation…

      बरगद और अमलताश

बरगद के उस विशाल पेड़ के छत्रछावं पर था जिसका अधिकार,
थे वो कुछ छोटे पेड़, जिसे बरगद कहता था अपना परिवार,
हवा के झोंके, रिमझिम बारिश, कभी सूखे की मार,
सब मिल कर हंसते-झूमते, करते सपनो को अपने साकार ।

 

 
दूर खड़ी अमलताश, पीले फुलों के आभुषण पहने,
सब तारीफों के पुल बांधते, उसकी मीठी खुशबु से सारा जंगल महके,
लेकिन वो रहती सिर्फ बरगद के ख्यालों को समेटे,
उसके दुख मे रोती, उसके सुख मे हंसती, वो बहके बहके ।

 

 
बरगद पुछता, क्या चाहिए तुम्हें मीठी, बोलो ना,
वो कहती, नही चाहिए कुछ भी, बस लिपटा लो ना,
दोनों की जड़ता, मन के अपनापन में कभी बांधा ना बना,
प्राण-शक्ति की वो परिभाषा, बेगाना कोई कैसे समझेगा ।

 

 
बरगद की जड़े बड़कर पहुचीं उसके जड़ो तक, मदमाती,
हवा में बहके, सांसो की वो खुशबु मन्द-मन्द सरसराती,
प्रगाढ़ वो अन्र्तमन की बोली, मखमली सुकुन लेकर आती,
आपस में गुथ गई जड़े, बन गए वो चिर जीवनसाथी ।

 

 
लेकिन न था मंजुर बरगद के परिवार को यह अपनापन,
बोले, तोड़ना चाहती है वो हमारा घर, यही है उसका फन,
त्यागो उसको का फरमान गुंजा, असमन्जस्य में पड़ा मन,
अंतत: बरगद सोचा, परिवार ही है उसकी जिन्दगी, उसका धन ।

 

 
बोला, मीठी तुम हो समझदार, समझोगी मेरा प्यार,
रखुंगा तुम्हें दिल में सम्भालकर, करना मेरा इंतज़ार,
मीठी हंसकर बोली जाओ, लेकिन दिल दर्द से कर रहा था हाहाकार,
अपने जड़ो को अलग कर, छोड़ गया वो, रिसता रहा घाव की धार ।

 

 
उस दिन बसन्त का लहरा रहा था परचम, लेकिन मीठी ने पहना पतझड़ का लिबास,
परिवार के प्यार के आगे, मन का प्यार हारा, शायद सही था हिसाब,
हवा के झोंके से गिर पड़ी मीठी की वो ढुंढ सी काया, ओढे, स्वाभिमान का खिताब,
प्यार अगर है मन मे, तो फैलेगा हर अक्षर, समाप्त कैसे होगा यह किताब ।।